शुक्रवार, 6 मई 2011

अपनी पहचान


तोड़ दो सारे बंधनों को,
रस्मो को रिवाजों को,
बदल दो दिशा अपनी,
बदल दो पहचान अपनी,
अवधारणा को बदलो......
"चाह क्यूँ है स्वर्ण महल की,
इस चाह को बदलो,
बदल दो पहचान अपनी,
अवधारणा को बदलो.....
पग पग पर कांटे बिछे हो तो क्या,
आसमान में तेज निगाहे हो तो क्या,
स्वछन्द विचरण को अपनाओ,
बदल दो पहचान अपनी,
अवधारणा को बदलो.....
धो डालो हाथों की मेहँदी अपनी,
उन्मुक्त हो विचरो इस धरा पर,
अपनी पहचान बदलो,
तोड़ दो सारे बंधनों को,
रस्मो को रिवाजों को,
प्रथाओं को बदलो,
बदल दो दशा अपनी,
अपनी पहचान बदलो.................

2 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 10 - 05 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.blogspot.com/

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सुंदर सकारात्मक आव्हान लिए गहन अभिव्यक्ति.....